Friday, October 27, 2017

ताजमहल के हिन्दू मंदिर होने के सबूत, ईंट की दीवार बनाकर बंद कर रखे है 22 कमरे

ताजमहल के हिन्दू मंदिर होने के सबूत, ईंट की दीवार बनाकर बंद कर रखे है 22 कमरे 

 

तेजोमय शिव मंदिर या ताजमहल मकबरा.......…? 

आगरा के ताजमहल का सच सम्पूर्ण विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने वाले श्री पी.एन. ओक अपनी पुस्तक “Tajmahal is a Hindu Temple Palace” और “Taj Mahal: The True Story” में 100 से भी अधिक प्रमाण और तर्को का हवाला देकर दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मंदिर है जिसका असली नाम तेजोमहालय है। 

प्रो. ओक. बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी विसंगतियों को इंगित करते हैं जो शिव मंदिर के पक्ष में विश्वास का समर्थन करते हैं। प्रो. ओक के अनुसार ताजमहल विशाल मकबरा न होकर विशेषतः हिंदू शिव मन्दिर है और आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहाँ के काल से बंद पड़े हैं, जो आम जनता की पहुँच से परे हैं।

 प्रो. ओक. ने यह भी जोर देकर कहते हैं कि हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान् शिव की मूर्ति,त्रिशूल,कलश और ॐ आदि वस्तुएं प्रयोग की जाती हैं। ताज महल के सम्बन्ध में यह आम किवदंत्ती प्रचलित है कि ताजमहल के अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूँद बूँद कर पानी टपकता रहता है, यदि यह सत्य है तो पूरे विश्व मे किसी किभी कब्र पर बूँद बूँद कर पानी नही टपकाया जाता,जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में ही शिवलिंग पर बूँद बूँद कर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है,फ़िर ताजमहल (मकबरे) में बूँद बूँद कर पानी टपकाने का क्या मतलब? इस बात का तोड़ आज तक नहीं खोजा जा सका है।

राजनीतिक भर्त्सना के डर से इंदिरा सरकार ने ओक की सभी पुस्तकें स्टोर्स से वापस ले लीं थीं और इन पुस्तकों के प्रथम संस्करण को छापने वाले संपादकों को भयंकर परिणाम भुगत लेने की धमकियां भी दी गईं थीं। प्रो. पी. एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत या सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए, और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दे!

पी. एन. ओक. को छोड़ कर किसी ने कभी भी इस कथन को चुनौती नही दी कि “ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था” प्रो.ओक. अपनी पुस्तक “TAJ MAHAL – THE TRUE STORY” द्वारा इस बात में विश्वास रखते हैं कि सारा विश्व इस धोखे में है कि खूबसूरत इमारत ताजमहल को मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने बनवाया था। 

ओक कहते हैं कि ताजमहल प्रारम्भ से ही बेगम मुमताज का मकबरा न होकर,एक हिंदू प्राचीन शिव मन्दिर है जिसे तब तेजो महालय कहा जाता था। अपने अनुसंधान के दौरान ओक ने खोजा कि इस शिव मन्दिर को शाहजहाँ ने जयपुर के महाराज जयसिंह से अवैध तरीके से छीन लिया था और इस पर अपना कब्ज़ा कर लिया था।

शाहजहाँ के दरबारी लेखक “मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी” ने अपने “बादशाहनामा” में मुग़ल शासक बादशाह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से ज़्यादा पृष्ठों मे लिखा है, जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि, शाहजहाँ की बेगम मुमताज-उल-ज़मानी जिसे मृत्यु के बाद, बुरहानपुर मध्य प्रदेश में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था और इसके 6 माह बाद तारीख़ 15 ज़मदी-उल- अउवल दिन शुक्रवार,को अकबराबाद आगरा लाया गया फ़िर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए, आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) मे पुनः दफनाया गया,लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों कि इस आली मंजिल से बेहद प्यार करते थे ,पर बादशाह के दबाव मे वह इसे देने के लिए तैयार हो गए थे। 

इस बात कि पुष्टि के लिए यहाँ ये बताना अत्यन्त आवश्यक है कि जयपुर के पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनो आदेश अभी तक रक्खे हुए हैं जो शाहजहाँ द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा जयसिंह को दिए गए थे। शाहजहां की बेगम अर्जुमंद बानो (मुमताज) बुरहानपुर (म0प्र0) में 14वें बच्चे के जन्म के समय मरी। उसे वहीं दफना दिया गया था। फिर आगरा में उसकी कब्र कहां से आ गयी? और एक नहीं, दो कबे्रं। एक ऊपर एक नीचे। एक को असली और दूसरी को नकली कहते हैं, जबकि वे दोनों ही नकली हैं। 

मुस्लिम समाज में कब्र खोदना कुफ्र है, और शाहजहां यह काम कर अपनी बेगम को जहन्नुम में भेजना कैसे पसंद कर सकता था?

इसी प्रकार ताजमहल का मूल नाम तेजोमहालय है, जो भगवान शंकर का मंदिर था। यह मुगलों के चाकर राजा जयसिंह के वीर पूर्वजों ने बनवाया था; पर शाहजहां ने दबाव डालकर जयसिंह से इसे ले लिया। फिर कुरान की आयतें खुदवा कर और नकली कब्रें बनाकर उसे प्रेम का प्रतीक घोषित कर दिया। 

नकली कब्रें जानबूझ कर वहीं बनाई गयीं, जहां शिवलिंग स्थापित था, ताकि भविष्य में भी उसे हटाकर कभी असलियत सामने न आ सके। ताजमहल में नीचे की ओर अनेक कमरे हैं, जिन्हें खोला नहीं जाता। कहते हैं कि वहां वे सब देव प्रतिमाएं रखी हैं, जिन्हें मंदिर से हटा दिया गया था। कार्बन डेटिंग के आधार पर इसे 1,400 साल पुराना बताया गया है, पर इस सच को सदा छिपाया जाता है..... 

Thursday, October 26, 2017

गाय से प्रेम, हूरों के सपने और सुसाइड बॉम्बर

Tabish Siddiqui : कामसूत्र भारत में लगभग 300 BC में लिखी गयी.. उस समय ये किताब लिखी गयी थी प्रेम और कामवासना को समझने के लिए.. कामसूत्र में सिर्फ बीस प्रतिशत ही भाव भंगिमा कि बातें हैं बाक़ी अस्सी प्रतिशत शुद्ध प्रेम है.. प्रेम के स्वरुप का वर्णन है.. वात्सायन जानते थे कि बिना काम और प्रेम को समझे आत्मिक उंचाईयों को समझा ही नहीं जा सकता है कभी.. ये आज भी दुनिया में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली किताबों में से एक है
भारत किसलिए अलग था अन्य देशों से? संभवतः इसीलिए.. क्यूंकि भारत जिस मानसिक खुलेपन की बात उस समय कर रहा था वो शायद ही किसी सभ्यता ने की थी.. मगर धीरे धीरे विदेशी प्रभावों से यहाँ की मानसिकता दूषित हो गयी.. खजुराहो के मंदिर इस्लाम के आने के कुछ ही सौ साल बाद बने.. ये बताता है कि उस वक़्त तक यहाँ अपनी संस्कृति और समझ को स्वीकार करने की हिम्मत थी.. यहाँ तक की भारत की पूजा पद्धति में अभी तक नग्नता पूजनीय है.. जीवन कि उत्पत्ति के अंग पूजनीय स्वीकार किये गए हैं मगर आज वही पूजने वाले शर्माते हैं अगर कोई उनसे सवाल करे तो वो लिंग और योनी के दार्शनिक पहलू समझाने लगते हैं.. ये बताता है कि भीतर से उन्हें ये स्वीकार्य नहीं है.. विदेशी प्रभावों द्वारा ये अपनी परंपरा से शर्मिंदा हैं.. बस परंपरा निभा रहे हैं किस तरह

बैन (निषेध) तो भारत ने शायद कि किसी चीज़ पर लगाया हो.. खासकर जहाँ प्रेम कि बात आये वहां तो ये संस्कृति और सभ्यता के हिसाब से एक असंभव बात लगती है.. निषेध की मानसिकता इस्लामिक मानसिकता है.. शराब लोग ज्यादा पियें तो शराब बंद कर दो.. काम (सेक्स) निषेध कर दो.. साथ घूमना.. गले में हाथ डालना.. आलिंगन करना.. ये सब निषेध है इस्लामिक मानसिकता में.. भारत का इस से कोई लेना देना नहीं है.. मगर चूँकि उनसे नफरत करते करते हमने कब उनही की चीज़ें ओढ़ लीं ये पता ही न चल पाया.. साधू और साध्वी हमे जो ब्रहमचारी हों वो अधिक भाने लगे.. इस्लाम के तरह ही जो हर चीज़ के निषेध कि बात करता हो उसे हम सर आखों पर बिठाने लगे

सोचिये अगर तालिबान को कामसूत्र दे दी गयी होती पढने को.. और ये कहा गया होता कि ये बिलकुल भी निषेध नहीं है.. जैसे जीना चाहते हो वैसे जियो.. प्रेम तुम्हे किसी से भी हो सकता है और अल्लाह तुम्हारे प्रेम पर पहरा नहीं लगा रहा है.. तो क्या उन्हें किसी हूर कि चाहत होती कभी? यूरोप के लोग क्यूँ नहीं मरते हैं हूर की चाहत में? वो क्यूँ नहीं शराब की नदियों के लिए जन्नत कि कल्पना करते हैं? क्यूंकि उनके लिए ये निरी बेवकूफी भरी बातें हैं.. उनके डिस्को में हूरों की कमी नहीं है.. और ऐसा नहीं है कि वो उनसे रेप कर रहे हों.. मर्ज़ी का सौदा होता है प्रेम का वहां.. शराब उनके यहाँ अथाह है और हर तरह की है.. उन्हें किसी जन्नत की ज़रूरत नहीं है शराब पीने के लिए.. उन्होंने अपने देश को ही जन्नत बना रखा है.. और इसीलिए हर मुल्क का हर नागरिक अमेरिका में रहने के सपने देखता है.. क्या है अमेरिका में? वहां कुछ नहीं है बस आपके जन्नत कि कल्पना को धरती पर साकार कर दिया है उन्होंने.. वहां वो खुलापन है जो कभी भारत में था.. इसीलिए आप मरते हैं वहां जाने के लिए

भारत अमेरिका हो सकता था.. और अभी भी हो सकता है.. अगर किसी चीज़ की ज़रूरत है हमे तो वो है सख्त कानून और मानवाधिकार.. बाक़ी किसी भी चीज़ पर बैन लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है.. और वैसे भी ये निषेध हमारी संस्कृति के ही विरुद्ध है.. और प्रेम पर बैन तो ये बताता है कि आपको अपने धर्म की रत्ती भर समझ नहीं है.. आप के भीतर सिर्फ इस्लाम की कुंठा भर गयी है बस

निषेध लोगों को जीवन विरोधी बना देता है.. उन्हें कुंठित कर देता है.. जिन नौजवानों को स्त्री/पुरुष से प्रेम करना है उन्हें आप गाय से प्रेम करना सिखा रहे हैं और जिन्हें इस जीवन में कामसूत्र पढनी चाहिए उन्हें आप हूरों के सपने दिखा रहे हैं.. और ऐसा करके आप सुसाईड बॉम्बर पैदा कर रहे हैं.. एक की परिकल्पना साकार रूप ले चुकी है और वो इस निषेध से तंग आकर अब हूरों से मिलने को लालायित हैं और दुसरे बस तय्यारी कर रहे हैं.. ये बहुत धीरे धीरे होता है मगर आज नहीं तो कल आप उन्हें भी यही समझाने में सफल हो जायेंगे कि कहाँ इन गंदे मांस के लोथड़ों के पीछे पड़े हो.. वहां स्वर्ग की अप्सराओं का सोचो.. और शराब यहाँ नहीं वहां सवर्ग में मिलेगी भरपूर.. यहाँ बस तुम लट्ठ ले कर जैसा हम कहते हैं वैसा करते रहो बस

-ताबिश

फेसबुक के चर्चित लेखक और चिंतक ताबिश सिद्दीकी की वॉल से.

mhatma ghandhi pariwar.

नाम : मोहनदास करमचंद गांधी। उपनाम : बापू, संत, राष्ट्रपिता, महात्मा गांधी। जन्मतिथि : 2 अक्तूबर 1869। जन्म स्थान : पोरबंदर, गुजरात। विशेष : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंहिसक और शांतिप्रिय प्रमुख क्रांतिकारी, जन्मदिन पर राष्ट्रीय अवकाश, भारतीय मुद्रा पर फोटो, सरकारी कार्यालयों में तस्वीर। बचपन से ही विद्यालयों में बच्चों को बापू के बारे में बताया जाता है और उनकी जीवनी रटाई जाती है। दे दी हमें आजादी बिना खडग़ बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। गाना भी हिंदुस्तानियों की जुबां पर सुना जा सकता है। लेकिन नाम गुम जाएगा चेहरा ये नजर आएगा... कहावत आज बापू पर चरितार्थ होती दिख रही है। बस फर्क इतना है कि नाम गांधी जयंती पर याद आता है और चेहरा कभी कभार नोट को ध्यान से देखने पर दिखता है। इतनी जानकारी आज स्वतंत्र भारत में अधिकांशत : हर पढ़े-लिखे व्यक्ति को पता है।
गांधी की जीवनी बचपने में पढऩे के बाद हर वर्ष 2 अक्तूबर को राष्ट्रीय अवकाश वाले दिन भी गांधी से संबंधित कई लेख पढऩे को मिल जाते हैं। लेकिन महात्मा गांधी के बाद उनके परिवार का क्या हुआ? उनके कितने बच्चे थे? आज उनके परिवार के सदस्य जीवित भी हैं या नहीं? उनके परिवार की कितनी पीढिय़ां आज मौजूद हैं? वे क्या कर रहीं हैं? कहां हैं? कितने सदस्य हैं? जैसे तमाम सवाल हैं जिनका जवाब पढ़े-लिखे तो क्या विशेषज्ञों और पीएचडी धारकों को भी नहीं पता होंगे। लेकिन आज आपको बताते हैं महात्मा गांधी के परिवार की मौजूदा स्थिति के बारे में।
इंटरनेट की एक वेबसाइट की मानें तो बापू के पौत्र, प्रपौत्र और उनके भी आगे के वंशज आज विश्व में छह देशों में निवास कर रहे हैं। जिनकी कुल संख्या 136 सदस्यों की है। हैरानी होगी यह सुनकर कि इनमें से 12 चिकित्सक, 12 प्रवक्ता, 5 इंजीनियर, 4 वकील, 3 पत्रकार, 2 आईएएस, 1 वैज्ञानिक, 1 चार्टड एकाउंटेंट, 5 निजी कंपनियों मे उच्चपदस्थ अधिकारी और 4 पीएचडी धारी हैं। इनमें सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि मौजूदा परिवार में लड़कियों की संख्या लड़कों से काफी ज्यादा है। आज उनके परिवार के 136 सदस्यों में से 120 जीवित हैं। जो भारत के अलावा अमेरीका, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और इंग्लैंड में रहते हैं।
बापू के बारे में : महात्मा गांधी के पिता का नाम करमचंद्र और माता का नाम पुतलीबाई था। अपने परिवार में सबसे छोटे बापू की एक सबसे बड़ी बहन और दो बड़े भाई थे। इनकी सबसे बड़ी बहन रलियत, फिर भाई लक्ष्मीदास और भाभी नंद कुंवरबेन, भाई कृष्‍णदास और भाभी गंगा थीं।
बापू का परिवार : सबसे बड़े पुत्र हरिलाल (1888-18 जून 1948) का ब्याह गुलाब से हुआ। जबकि दूसरे पुत्र मणिलाल (28 अक्तूबर 1892- 4 अप्रैल 1956) की पत्नी का नाम सुशीला था। तीसरे पुत्र रामदास (1897-1969) की शादी निर्मला से हुआ। जबकि चौथे और अंतिम पुत्र देवदास (1900-1957) की पत्नी लक्ष्मी थीं।
वंशावली दूसरी पीढ़ी से
-  रामिबेन गांधी-कवंरजीत परिख
ए. अनसुया परिख-मोहन परिख
क. राहुल परिख-प्रभा परिख        ख. लेखा-नरेन्द्र सुब्रमण्यम
अवनी व अक्षय                    अमल
2. सुधा वजरिया-व्रजलाल वजरिया
क. मनीषा-राजेश परिख         ख. पारुल-निमेष बजरिया
नील व दक्ष                         अनेरी व सार्थक
ग. रवि वजरिया-शीतल वजरिया
आकाश व वीर
3. प्रबोध परिख-माधवी परिख
क. सोनल-भरत परिख        ख. पराग-पूजा परिख
रचना व गौरव                     प्राची व दर्शन
4. नीलम परिख-योगेन्द्र परिख
क. समीर परिख-रागिनी पारिख
सिद्धार्थ, पार्थ व गोपी
- कांतिलाल गांधी-सरस्वती गांधी
क. शांतिलाल-सुझान गांधी
अंजली, अलका , अनिता व एना
2. प्रदीप गांधी-मंगला गांधी
प्रिया व मेघा
-रसिकलाल गांधी
-मनुबेन गांधी-सुरेन्द्र मशरूवाला
1. उर्मि देसाई-भरत देसाई
क. मृणाल देसाई-आरती देसाई       ख. रेणू देसाई

-शांतिलाल गाँधी
-सीता गांधी-शशीकांत धुबेलिया
1. कीर्ति मेनन-सुनील मेनन
सुनीता
2. उमा मिस्त्री-राजेन मिस्त्री
सपना
3. सतीश धुपेलिया-प्रतिभा धुपेलिया
मीशा, शशिका व कबीर
-अरुण गांधी-सुनंदा गांधी
क. तुषार गांधी-सोनल गांधी       ख. अर्जना प्रसाद- हरि प्रसाद
विवान व कस्तूरी                         अनिष व परितोष
-इला गांधी-मेवालाल रामगोबिन
क. कृष गाँधी
ख. आरती रामगोबिन
ग. केदार रामगोबिन-मृणाल रामगोबिन
घ. आशा रामगोबिन
ड़. आशिष रामगोबिन-अज्ञात
मीरा व निखिल
-सुमित्रा गांधी-गजानन कुलकर्णी
1. सोनाली कुलकर्णी
2. श्रीकृष्ण कुलकर्णी-नीलू कुलकर्णी
विष्णु
3. श्रीराम कुलकर्णी-जूलिया कुलकर्णी
शिव
-कहान गांधी-शिव लक्ष्मी गांधी
-उषा गोकाणी-हरीश गोकाणी
1. संजय गोकाणी-मोना गोकाणी
नताशा व अक्षय
2. आनंद गोकाणी-तेजल गोकाणी
करण व अर्जुन
-रामचंद्र गांधी-इंदू गांधी
लीना गाँधी
-तारा भट्टाचार्य-ज्योति भट्टाचार्य
1. विनायक भट्टाचार्य-लूसी भट्टाचार्य
इण्डिया अनन्या, अनुष्का तारा व एंड्रीया लक्ष्मी
2. सुकन्या भरतराम-विवेक भरतनाम
अक्षर विदूर
-राजमोहन गांधी-उषा गांधी
1. देवव्रत गांधी
2. सुप्रिया गाधी
-गोपाल कृष्ण गांधी-तारा गांधी
1. अनिता गांधी
2. दिव्या गांधी
3. रुस्तम मणिया