
बाल ठाकरे की कमजोरी थी सिगार, नॉन वेज और व्हाइट वाइन
भारत में शायद ही ऐसा कोई पत्रकार हो जिसने अपने कॅरियर के दौरान कभी न
कभी शिव सेना सुप्रीमो बाल ठाकरे का साक्षात्कार लेना न चाहा हो। मैं खुद
को बाकियों से ज्यादा सौभाग्यशाली मानता हूं। मैंने बाल ठाकरे का
साक्षात्कार एक नहीं, कई बार किया। अंतिम बार मैंने उनका साक्षात्कार शराब
पीने के दौरान किया था। सही मायनों में यह साक्षात्कार कम और आपसी बातचीत
ज्यादा था, क्योंकि हम राजनीति से इतर भोजन, शराब और सिगार जैसे विषयों पर
बात कर रहे थे। सिगार बाल ठाकरे का नया शौक था। हमने क्रिकेट पर भी बात की
क्योंकि यह उनकी पुरानी पसंद रहा है। बाल ठाकरे के पसंदीदा क्रिकेटर सचिन
तेंडुलकर और सुनील गावस्कर रहे हैं। दोनों मराठी हैं और बाल ठाकरे तो मराठी
मानुष के हितों की ही बात हमेशा करते रहे हैं। उन्होंने दोनों की
सार्वजनिक तौर पर निंदा और तारीफ, दोनों की। यह इस बात पर निर्भर करता था
कि वे पाकिस्तान के खिलाफ कैसा खेल रहे हैं। बाल ठाकरे ने पाकिस्तान की
क्रिकेट टीम को कभी पसंद नहीं किया।
मुझे याद है, उस समय भारतीय
टीम दक्षिण अफ्रीका का दौरा कर रही थी। भारत के विकेट लगातार गिर रहे थे,
गुस्साए बाल ठाकरे ने टीवी बंद कर दिया। बाहर नवरात्रि का जश्न जारी था।
उन्होंने मजाकिया लहजे में टिप्पणी की, 'यहां लोग डांडिया खेल रहे हैं और
वहां दक्षिण अफ्रीकी हमारी डंडियां बिखेर रहे हैं।' यह टिप्पणी करते वक्त
उनके हाथ में दारू का गिलास था। बातचीत के दौरान उन्होंने अपना टेप
रिकार्डर ऑन नहीं किया था। वो हमेशा इसे ऑन कर देते थे ताकि बाद में कोई
पत्रकार उनकी बात को गलत तरीके से पेश न कर दे। बाल ठाकरे किसी के डर से
ऐसा नहीं करते थे, उन्हें किसी का डर था भी नहीं, लेकिन खराब पत्रकारिता से
उन्हें बहुत खीज होती है। उन्हें कई बार उन बयानों पर सफाई देने के लिए
मजबूर किया जाता था जो उन्होंने कभी दिए ही नहीं थे और गलत तरीके से
प्रकाशित किए गए थे।
मेरे लिए बाल ठाकरे का साक्षात्कार करना
पत्रकारिता का सबसे आसान काम था। इसके लिए ज्यादा तैयारी करने की जरूरत
नहीं थी। वो खुद ही बातें करते थे, खुद ही मुद्दे और सवाल उठाते थे और
मजाकिया और आलोचनात्मक लहजे में इस अंदाज में जबाव देते थे जो किसी और
राजनेता के वश की बात नहीं थी। मैं उनकी वाकपटुता के लिए उनकी प्रशंसा करता
हूं। वैसे ही, जैसे भीड़ खींचने, जनता को हिला कर रख देने, मुंबई को बंद
करवा देने और अपने इशारों पर घुटनों के बल टिकने के लिए मजबूर कर देने की
उनकी क्षमता की करता हूं। भले ही इसकी आलोचना होती रही है लेकिन यह लोगों
पर उनका प्रभाव दर्शाता है। यह उनकी ताकत का प्रतीक है, और राजनेता ताकत से
अलग चाहते भी क्या हैं? हालांकि बाला साहेब की बात सबसे अलग है। वह एक
राजनीतिक पार्टी के नेता हैं, न कि राजनीतिज्ञ। वो कभी भी किसी राजनीतिक पद
के लालची नहीं रहे। जब महाराष्ट्र में उनकी पार्टी शिवसेना ने भाजपा के
साथ मिलकर सरकार बनाई तब उन्होंने कोई पद नहीं लिया बल्कि अपने किले
मातोश्री से सरकार को अपने रिमोट कंट्रोल से चलाया।
मैंने न ही
कभी उनकी विचारधारा की चिंता की और न ही कभी विश्व के बारे में उनकी राय की
और न ही इस बात की कि उनके प्यारे महाराष्ट्र में क्या हो रहा है। लेकिन
जब भी मेरी उनसे मुलाकात हुई, मैंने खुद को भले ही प्रबुद्ध न पाया हो
लेकिन मनोरंजित तो जरूर पाया। बाला साहेब से बात करना हमेशा एक शानदार
अनुभव रहा। अपने मजाकिया लहजे से वो आपको मनोरंजित करते थे, अपनी
आलोचनात्मक शैली से तंज कसते थे और अपने ज्ञान के भंडार से चकित कर देते
थे। लोगों की नब्ज पर उनकी मजबूत पकड़ थी और वो जानते थे कि उनसे लोगों को
क्या चाहिए। इसलिए ही महाराष्ट्र में आजादी के बाद जितने भी नेता पैदा हुए
हैं उनमें बाल ठाकरे को मराठी मानुष के हितों की बात करने वाला सच्चा
चैंपियन कहा जा सकता है।
बाल ठाकरे के साथ अपनी उस अंतिम
मुलाकात पर लौटता हूं। जाम से जाम टकराते हुए ही मुझे मालूम हुआ था कि बाला
साहेब ठाकरे एक समय बेहद आनंदमय रहते थे और पुरानी बंबई (मैंने जब बंबई
कहा तो उन्होंने मुंबई कहलवाया) के रेस्त्राओं में परोसे जाने वाले
कांटिनेंटल और चाईनीज फुड के बारे में पूरे अधिकार से बात करते थे। वह खुद
भी घर में बने हुए मराठी खाने और चर्चगेट के ओल्ड गॉर्डन रेस्टोरेंट के
इटालियन पास्ता के जबरदस्त प्रशंसक थे। अपनी पुरानी पसंद को याद करते हुए
बाल ठाकरे ने कहा था, 'लेकिन यह उस वक्त की बात है जब 1950 के दशक में मैं
फ्री प्रैस जर्नल में कार्टूनिस्ट हुआ करता था।' उन्होंने कहा,
'दुर्भाग्यवश राजनीति ने मेरे स्वाद को भी नष्ट कर दिया है। वैसे ही, जैसे
कार्टून बनाने के लिए जरूरी ध्यान को नष्ट किया है। किसी जमाने में मैं
खाने का शौकीन था और अच्छे खाने का स्वाद जानता था। हम मुंबई के सबसे अच्छे
रेस्त्रां से मंगाकर घर पर खाना खाते थे। मेरी पत्नी, जो खुद बहुत अच्छी
कुक हैं, चाइनीज खाना पसंद करती थी। मुझे थाई फुड पसंद था क्योंकि यह बहुत
लजीज होता है। लेकिन अब मैं स्वादिष्ट खाने का लुत्फ नहीं उठा सकता क्योंकि
अब मेरे पास खाने के लिए वक्त ही नहीं है। अब इतने ज्यादा लोग मिलने आते
हैं, हमेशा फोन बजता रहता है, न सोने के लिए वक्त है न ही पढ़ने के लिए
वक्त है। मैं अब स्वादिष्ट भोजन की भूख को मिस करता हूं। अब मैं न ही मटन
बिरयानी खाता हूं और न ही फिश करी का लुत्फ लेता हूं। अब मुझे हल्का खाना
ही पसंद है, सादा भारतीय वेज भोजन बिना मसालों के, स्टीम किया गया या उबाला
हुआ। न ही तीखा और न ही मसालेदार। दाल चावल, एक दो फुल्के और मिठाई भी न
के बराबर। हां नारियल से बने डेजर्ट अब भी खाता हूं। चाय और कॉफी नहीं
पीता। फ्री प्रेस जर्नल के दिनों में तो मैं काजू और कोल्ड कॉफी पर ही दिन
काट देता था। उस वक्त मैं खाना खुद भी बनाता था। जब मैंने अमेरिका में
आर्टिस्ट ब्रैडफोर्ड के साथ वक्त बिताया था तब मैं सूप बनाता था, चीज, अंडे
और क्रीम क्रेकर बिस्कुट खाता था। सूप खराब भी बना होता था तो ब्रैडफोर्ड
कहता था- कूल मैन।'
ये उस जमाने की बात है जब मैंने पत्रकारिता
शुरू भी नहीं की थी। अभी तो वो मेरे सामने फ्रेंच वाइन पी रहे थे और साथ ही
हवाना सिगार का धुंआ उड़ा रहे थे। वो जानते थे कि मैं भी सिगार पीता हूं,
उन्होंने मेज पर रखे सिगार होल्डर की ओर इशारा करके एक लेने के लिए कहा
लेकिन उनके सम्मान के कारण मैंने सिगार नहीं उठाया। हां, मैंने वाइन का एक
गिलास जरूर लिया। लेकिन यह भयानक था, व्हाइट वाइन को रूम टेंप्रेचर पर पेश
किया जाता है। लेकिन यूरोप में रूम टेंप्रेचर 8-18 डिग्री के बीच होता है न
कि बांद्रा की तरह 32 डिग्री सेल्सियस। और बाला साहेब अपनी दारू को ठंडा
करने में भी विश्वास नहीं रखते थे।
उन्होंने विनम्रता से पूछा,
'वाइन कैसी है।' मैंने इस सवाल को टालकर उनका ध्यान सिगार की ओर बंटाया।
मैंने कहा, 'आपको कभी भी सिगार या पाइप के बिना नहीं देखा जाता है।' मेरी
ओर धुंआ उड़ाते हुए उन्होंने कहा, 'आजकल तो बस सिगार, पाइप मैंने 1995 में
ही दिल के आपरेशन के बाद छोड़ दिया था। लेकिन अभी भी कभी-कभी मैं पाइप पीने
को मिस करता हूं। तंबाकू की सुगंध कितनी अच्छी होती थी, मुझे तो ब्रांड के
नाम भी याद हैं..मार्को पोलो, थ्री नन्स और एक और जिसका नाम हैनरी या ऐसा
ही कुछ था। मेरे पास पाइप का बड़ा कलेक्शन था। मुझे कोलोन से उन्हें साफ
करने में मजा आता था।' बाल ठाकरे को सिगार विदेश यात्रा से आए उनके मित्र
देते थे। उन्होंने कभी भी खुद सिगार नहीं खरीदा। उन्हें हवाना का चर्चिल
सिगार सबसे ज्यादा पसंद था। सिगार का धुंआ हवा में उड़ाते हुए उन्होंने
कहा, 'मैं इन्हें पसंद करता हूं, ये मोटे और लंबे होते हैं। लेकिन मैं
लगातार इन्हें नहीं पाता, बीच-बीच में ब्रेक लेता हूं।'
धुम्रपान की लत बाल ठाकरे को 1954 में लगी थी। उस वक्त वो फ्री प्रेस जर्नल
में कार्टूनिस्ट थे। उस वक्त को याद करते हुए उन्होंने कहा था, 'मुझे
जुकाम रहता था, न मैं अपनी नाक सिनक पाता था और न ही खींच पाता था। बहुत
खराब लगता था। लेकिन धुम्रपान से मेरी नाक ठीक हो गई। उन दिनों में
तिरुचिरापल्ली का 'मोर छाप' तंबाकू पीता था। इसके बाद किसी ने मुझे समझाया
कि पाइप (हुक्का) मेरे स्टाइल को ज्यादा भाता है। पाइप के बाद सिगार मेरा
शौक बन गए।' बाल ठाकरे ने बताया कि उन्हें मुंह में सिगार लिए या हाथ में
पाइप लिए अखबारों में प्रकाशित होने वाली तस्वीरों को देखकर अच्छा लगता था।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें धुम्रपान की लत नहीं है। उन्होंने
कहा, 'मैं जब चाहूं तब तंबाकू छोड़ सकता हूं लेकिन यह मुझे मेरी थकान और
अकेलेपन से राहत देता है। कई बार मैं बहुत अकेला और दयनीय हालत में होता
हूं। पत्नी और बेटे की दुर्घटना में मौत के बाद सिगार ही मेरा साथी बन गया।
यह मुझे आगे बढ़ने में मदद करता है और मेरे एकांत को दूर करता है।'
मैं एक स्थानीय गैर कानूनी शराब की दुकान से हेनेकेन बीयर की पेटी लेकर
'मातोश्री' पहुंचा था। उनका बीयर छोड़कर वाइन पीना शुरू कर देना मेरे लिए
खबर थी। मैंने पूछा कि बीयर छोड़कर वाइन कब से शुरू कर दी। उन्होंने कहा,
'मैंने कार्टूनिस्ट के दिनों के दौरान बीयर पीना शुरू किया था। एक अमेरिकी
महिला ने मुझसे कहा था कि उनके देश में तो बच्चे भी बीयर पीते हैं। हेनेकेन
अच्छा ब्रांड है लेकिन मैंने सभी स्थानीय बीयर भी पी हैं। मैंने बीयर पीना
इसलिए छोड़ दिया क्योंकि इसमें कैलोरी बहुत अधिक होती हैं। हालांकि मैं
बहुत कम बीयर पीता था। लेकिन अब मैं व्हाइट वाइन पीता हूं। फ्रेंच और
इंडियन। कभी-कभी शैंपेन भी पी लेता हूं, एक या दो गिलास।' मैंने पूछा घर पर
या पब्लिक में। मेरी इस गुस्ताखी पर बाला साहेब ने गुस्सा दिखाते हुए कहा,
'घर पर। मैं सार्वजनिक तौर पर कभी-कभार ही पीता हूं। मैं एक जेंटलमैन की
तरह व्यवहार करना पसंद करता हूं।' मैंने एक बार फिर जल्दी से उनका ध्यान
दूसरे सवाल की ओर खींचा- लेकिन व्हाइट वाइन क्यों, रेड आपके दिल के लिए
ज्यादा अच्छी है? किसी भी वार्तालाप में अंतिम शब्द और हंसी बाला साहेब
ठाकरे की ही होती थी। इस बार भी ऐसा ही हुआ उन्होंने कहा-'मैं समझता हूं कि
यह दिल के लिए बेहतर है।' और चालाकी से बात को पूरा करते हुए उन्होंने
कहा, 'लेकिन व्हाइट वाइन मुझे ज्यादा सूट करती है। और कौन कहता है कि मेरे
पास दिल है, मीडिया कहती है कि बेरहम, बेदिल हूं।'
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