Friday, October 27, 2017

ताजमहल के हिन्दू मंदिर होने के सबूत, ईंट की दीवार बनाकर बंद कर रखे है 22 कमरे

ताजमहल के हिन्दू मंदिर होने के सबूत, ईंट की दीवार बनाकर बंद कर रखे है 22 कमरे 

 

तेजोमय शिव मंदिर या ताजमहल मकबरा.......…? 

आगरा के ताजमहल का सच सम्पूर्ण विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने वाले श्री पी.एन. ओक अपनी पुस्तक “Tajmahal is a Hindu Temple Palace” और “Taj Mahal: The True Story” में 100 से भी अधिक प्रमाण और तर्को का हवाला देकर दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मंदिर है जिसका असली नाम तेजोमहालय है। 

प्रो. ओक. बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी विसंगतियों को इंगित करते हैं जो शिव मंदिर के पक्ष में विश्वास का समर्थन करते हैं। प्रो. ओक के अनुसार ताजमहल विशाल मकबरा न होकर विशेषतः हिंदू शिव मन्दिर है और आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहाँ के काल से बंद पड़े हैं, जो आम जनता की पहुँच से परे हैं।

 प्रो. ओक. ने यह भी जोर देकर कहते हैं कि हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान् शिव की मूर्ति,त्रिशूल,कलश और ॐ आदि वस्तुएं प्रयोग की जाती हैं। ताज महल के सम्बन्ध में यह आम किवदंत्ती प्रचलित है कि ताजमहल के अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूँद बूँद कर पानी टपकता रहता है, यदि यह सत्य है तो पूरे विश्व मे किसी किभी कब्र पर बूँद बूँद कर पानी नही टपकाया जाता,जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में ही शिवलिंग पर बूँद बूँद कर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है,फ़िर ताजमहल (मकबरे) में बूँद बूँद कर पानी टपकाने का क्या मतलब? इस बात का तोड़ आज तक नहीं खोजा जा सका है।

राजनीतिक भर्त्सना के डर से इंदिरा सरकार ने ओक की सभी पुस्तकें स्टोर्स से वापस ले लीं थीं और इन पुस्तकों के प्रथम संस्करण को छापने वाले संपादकों को भयंकर परिणाम भुगत लेने की धमकियां भी दी गईं थीं। प्रो. पी. एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत या सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए, और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दे!

पी. एन. ओक. को छोड़ कर किसी ने कभी भी इस कथन को चुनौती नही दी कि “ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था” प्रो.ओक. अपनी पुस्तक “TAJ MAHAL – THE TRUE STORY” द्वारा इस बात में विश्वास रखते हैं कि सारा विश्व इस धोखे में है कि खूबसूरत इमारत ताजमहल को मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने बनवाया था। 

ओक कहते हैं कि ताजमहल प्रारम्भ से ही बेगम मुमताज का मकबरा न होकर,एक हिंदू प्राचीन शिव मन्दिर है जिसे तब तेजो महालय कहा जाता था। अपने अनुसंधान के दौरान ओक ने खोजा कि इस शिव मन्दिर को शाहजहाँ ने जयपुर के महाराज जयसिंह से अवैध तरीके से छीन लिया था और इस पर अपना कब्ज़ा कर लिया था।

शाहजहाँ के दरबारी लेखक “मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी” ने अपने “बादशाहनामा” में मुग़ल शासक बादशाह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से ज़्यादा पृष्ठों मे लिखा है, जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि, शाहजहाँ की बेगम मुमताज-उल-ज़मानी जिसे मृत्यु के बाद, बुरहानपुर मध्य प्रदेश में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था और इसके 6 माह बाद तारीख़ 15 ज़मदी-उल- अउवल दिन शुक्रवार,को अकबराबाद आगरा लाया गया फ़िर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए, आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) मे पुनः दफनाया गया,लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों कि इस आली मंजिल से बेहद प्यार करते थे ,पर बादशाह के दबाव मे वह इसे देने के लिए तैयार हो गए थे। 

इस बात कि पुष्टि के लिए यहाँ ये बताना अत्यन्त आवश्यक है कि जयपुर के पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनो आदेश अभी तक रक्खे हुए हैं जो शाहजहाँ द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा जयसिंह को दिए गए थे। शाहजहां की बेगम अर्जुमंद बानो (मुमताज) बुरहानपुर (म0प्र0) में 14वें बच्चे के जन्म के समय मरी। उसे वहीं दफना दिया गया था। फिर आगरा में उसकी कब्र कहां से आ गयी? और एक नहीं, दो कबे्रं। एक ऊपर एक नीचे। एक को असली और दूसरी को नकली कहते हैं, जबकि वे दोनों ही नकली हैं। 

मुस्लिम समाज में कब्र खोदना कुफ्र है, और शाहजहां यह काम कर अपनी बेगम को जहन्नुम में भेजना कैसे पसंद कर सकता था?

इसी प्रकार ताजमहल का मूल नाम तेजोमहालय है, जो भगवान शंकर का मंदिर था। यह मुगलों के चाकर राजा जयसिंह के वीर पूर्वजों ने बनवाया था; पर शाहजहां ने दबाव डालकर जयसिंह से इसे ले लिया। फिर कुरान की आयतें खुदवा कर और नकली कब्रें बनाकर उसे प्रेम का प्रतीक घोषित कर दिया। 

नकली कब्रें जानबूझ कर वहीं बनाई गयीं, जहां शिवलिंग स्थापित था, ताकि भविष्य में भी उसे हटाकर कभी असलियत सामने न आ सके। ताजमहल में नीचे की ओर अनेक कमरे हैं, जिन्हें खोला नहीं जाता। कहते हैं कि वहां वे सब देव प्रतिमाएं रखी हैं, जिन्हें मंदिर से हटा दिया गया था। कार्बन डेटिंग के आधार पर इसे 1,400 साल पुराना बताया गया है, पर इस सच को सदा छिपाया जाता है..... 

Thursday, October 26, 2017

गाय से प्रेम, हूरों के सपने और सुसाइड बॉम्बर

Tabish Siddiqui : कामसूत्र भारत में लगभग 300 BC में लिखी गयी.. उस समय ये किताब लिखी गयी थी प्रेम और कामवासना को समझने के लिए.. कामसूत्र में सिर्फ बीस प्रतिशत ही भाव भंगिमा कि बातें हैं बाक़ी अस्सी प्रतिशत शुद्ध प्रेम है.. प्रेम के स्वरुप का वर्णन है.. वात्सायन जानते थे कि बिना काम और प्रेम को समझे आत्मिक उंचाईयों को समझा ही नहीं जा सकता है कभी.. ये आज भी दुनिया में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली किताबों में से एक है
भारत किसलिए अलग था अन्य देशों से? संभवतः इसीलिए.. क्यूंकि भारत जिस मानसिक खुलेपन की बात उस समय कर रहा था वो शायद ही किसी सभ्यता ने की थी.. मगर धीरे धीरे विदेशी प्रभावों से यहाँ की मानसिकता दूषित हो गयी.. खजुराहो के मंदिर इस्लाम के आने के कुछ ही सौ साल बाद बने.. ये बताता है कि उस वक़्त तक यहाँ अपनी संस्कृति और समझ को स्वीकार करने की हिम्मत थी.. यहाँ तक की भारत की पूजा पद्धति में अभी तक नग्नता पूजनीय है.. जीवन कि उत्पत्ति के अंग पूजनीय स्वीकार किये गए हैं मगर आज वही पूजने वाले शर्माते हैं अगर कोई उनसे सवाल करे तो वो लिंग और योनी के दार्शनिक पहलू समझाने लगते हैं.. ये बताता है कि भीतर से उन्हें ये स्वीकार्य नहीं है.. विदेशी प्रभावों द्वारा ये अपनी परंपरा से शर्मिंदा हैं.. बस परंपरा निभा रहे हैं किस तरह

बैन (निषेध) तो भारत ने शायद कि किसी चीज़ पर लगाया हो.. खासकर जहाँ प्रेम कि बात आये वहां तो ये संस्कृति और सभ्यता के हिसाब से एक असंभव बात लगती है.. निषेध की मानसिकता इस्लामिक मानसिकता है.. शराब लोग ज्यादा पियें तो शराब बंद कर दो.. काम (सेक्स) निषेध कर दो.. साथ घूमना.. गले में हाथ डालना.. आलिंगन करना.. ये सब निषेध है इस्लामिक मानसिकता में.. भारत का इस से कोई लेना देना नहीं है.. मगर चूँकि उनसे नफरत करते करते हमने कब उनही की चीज़ें ओढ़ लीं ये पता ही न चल पाया.. साधू और साध्वी हमे जो ब्रहमचारी हों वो अधिक भाने लगे.. इस्लाम के तरह ही जो हर चीज़ के निषेध कि बात करता हो उसे हम सर आखों पर बिठाने लगे

सोचिये अगर तालिबान को कामसूत्र दे दी गयी होती पढने को.. और ये कहा गया होता कि ये बिलकुल भी निषेध नहीं है.. जैसे जीना चाहते हो वैसे जियो.. प्रेम तुम्हे किसी से भी हो सकता है और अल्लाह तुम्हारे प्रेम पर पहरा नहीं लगा रहा है.. तो क्या उन्हें किसी हूर कि चाहत होती कभी? यूरोप के लोग क्यूँ नहीं मरते हैं हूर की चाहत में? वो क्यूँ नहीं शराब की नदियों के लिए जन्नत कि कल्पना करते हैं? क्यूंकि उनके लिए ये निरी बेवकूफी भरी बातें हैं.. उनके डिस्को में हूरों की कमी नहीं है.. और ऐसा नहीं है कि वो उनसे रेप कर रहे हों.. मर्ज़ी का सौदा होता है प्रेम का वहां.. शराब उनके यहाँ अथाह है और हर तरह की है.. उन्हें किसी जन्नत की ज़रूरत नहीं है शराब पीने के लिए.. उन्होंने अपने देश को ही जन्नत बना रखा है.. और इसीलिए हर मुल्क का हर नागरिक अमेरिका में रहने के सपने देखता है.. क्या है अमेरिका में? वहां कुछ नहीं है बस आपके जन्नत कि कल्पना को धरती पर साकार कर दिया है उन्होंने.. वहां वो खुलापन है जो कभी भारत में था.. इसीलिए आप मरते हैं वहां जाने के लिए

भारत अमेरिका हो सकता था.. और अभी भी हो सकता है.. अगर किसी चीज़ की ज़रूरत है हमे तो वो है सख्त कानून और मानवाधिकार.. बाक़ी किसी भी चीज़ पर बैन लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है.. और वैसे भी ये निषेध हमारी संस्कृति के ही विरुद्ध है.. और प्रेम पर बैन तो ये बताता है कि आपको अपने धर्म की रत्ती भर समझ नहीं है.. आप के भीतर सिर्फ इस्लाम की कुंठा भर गयी है बस

निषेध लोगों को जीवन विरोधी बना देता है.. उन्हें कुंठित कर देता है.. जिन नौजवानों को स्त्री/पुरुष से प्रेम करना है उन्हें आप गाय से प्रेम करना सिखा रहे हैं और जिन्हें इस जीवन में कामसूत्र पढनी चाहिए उन्हें आप हूरों के सपने दिखा रहे हैं.. और ऐसा करके आप सुसाईड बॉम्बर पैदा कर रहे हैं.. एक की परिकल्पना साकार रूप ले चुकी है और वो इस निषेध से तंग आकर अब हूरों से मिलने को लालायित हैं और दुसरे बस तय्यारी कर रहे हैं.. ये बहुत धीरे धीरे होता है मगर आज नहीं तो कल आप उन्हें भी यही समझाने में सफल हो जायेंगे कि कहाँ इन गंदे मांस के लोथड़ों के पीछे पड़े हो.. वहां स्वर्ग की अप्सराओं का सोचो.. और शराब यहाँ नहीं वहां सवर्ग में मिलेगी भरपूर.. यहाँ बस तुम लट्ठ ले कर जैसा हम कहते हैं वैसा करते रहो बस

-ताबिश

फेसबुक के चर्चित लेखक और चिंतक ताबिश सिद्दीकी की वॉल से.

mhatma ghandhi pariwar.

नाम : मोहनदास करमचंद गांधी। उपनाम : बापू, संत, राष्ट्रपिता, महात्मा गांधी। जन्मतिथि : 2 अक्तूबर 1869। जन्म स्थान : पोरबंदर, गुजरात। विशेष : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंहिसक और शांतिप्रिय प्रमुख क्रांतिकारी, जन्मदिन पर राष्ट्रीय अवकाश, भारतीय मुद्रा पर फोटो, सरकारी कार्यालयों में तस्वीर। बचपन से ही विद्यालयों में बच्चों को बापू के बारे में बताया जाता है और उनकी जीवनी रटाई जाती है। दे दी हमें आजादी बिना खडग़ बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। गाना भी हिंदुस्तानियों की जुबां पर सुना जा सकता है। लेकिन नाम गुम जाएगा चेहरा ये नजर आएगा... कहावत आज बापू पर चरितार्थ होती दिख रही है। बस फर्क इतना है कि नाम गांधी जयंती पर याद आता है और चेहरा कभी कभार नोट को ध्यान से देखने पर दिखता है। इतनी जानकारी आज स्वतंत्र भारत में अधिकांशत : हर पढ़े-लिखे व्यक्ति को पता है।
गांधी की जीवनी बचपने में पढऩे के बाद हर वर्ष 2 अक्तूबर को राष्ट्रीय अवकाश वाले दिन भी गांधी से संबंधित कई लेख पढऩे को मिल जाते हैं। लेकिन महात्मा गांधी के बाद उनके परिवार का क्या हुआ? उनके कितने बच्चे थे? आज उनके परिवार के सदस्य जीवित भी हैं या नहीं? उनके परिवार की कितनी पीढिय़ां आज मौजूद हैं? वे क्या कर रहीं हैं? कहां हैं? कितने सदस्य हैं? जैसे तमाम सवाल हैं जिनका जवाब पढ़े-लिखे तो क्या विशेषज्ञों और पीएचडी धारकों को भी नहीं पता होंगे। लेकिन आज आपको बताते हैं महात्मा गांधी के परिवार की मौजूदा स्थिति के बारे में।
इंटरनेट की एक वेबसाइट की मानें तो बापू के पौत्र, प्रपौत्र और उनके भी आगे के वंशज आज विश्व में छह देशों में निवास कर रहे हैं। जिनकी कुल संख्या 136 सदस्यों की है। हैरानी होगी यह सुनकर कि इनमें से 12 चिकित्सक, 12 प्रवक्ता, 5 इंजीनियर, 4 वकील, 3 पत्रकार, 2 आईएएस, 1 वैज्ञानिक, 1 चार्टड एकाउंटेंट, 5 निजी कंपनियों मे उच्चपदस्थ अधिकारी और 4 पीएचडी धारी हैं। इनमें सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि मौजूदा परिवार में लड़कियों की संख्या लड़कों से काफी ज्यादा है। आज उनके परिवार के 136 सदस्यों में से 120 जीवित हैं। जो भारत के अलावा अमेरीका, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और इंग्लैंड में रहते हैं।
बापू के बारे में : महात्मा गांधी के पिता का नाम करमचंद्र और माता का नाम पुतलीबाई था। अपने परिवार में सबसे छोटे बापू की एक सबसे बड़ी बहन और दो बड़े भाई थे। इनकी सबसे बड़ी बहन रलियत, फिर भाई लक्ष्मीदास और भाभी नंद कुंवरबेन, भाई कृष्‍णदास और भाभी गंगा थीं।
बापू का परिवार : सबसे बड़े पुत्र हरिलाल (1888-18 जून 1948) का ब्याह गुलाब से हुआ। जबकि दूसरे पुत्र मणिलाल (28 अक्तूबर 1892- 4 अप्रैल 1956) की पत्नी का नाम सुशीला था। तीसरे पुत्र रामदास (1897-1969) की शादी निर्मला से हुआ। जबकि चौथे और अंतिम पुत्र देवदास (1900-1957) की पत्नी लक्ष्मी थीं।
वंशावली दूसरी पीढ़ी से
-  रामिबेन गांधी-कवंरजीत परिख
ए. अनसुया परिख-मोहन परिख
क. राहुल परिख-प्रभा परिख        ख. लेखा-नरेन्द्र सुब्रमण्यम
अवनी व अक्षय                    अमल
2. सुधा वजरिया-व्रजलाल वजरिया
क. मनीषा-राजेश परिख         ख. पारुल-निमेष बजरिया
नील व दक्ष                         अनेरी व सार्थक
ग. रवि वजरिया-शीतल वजरिया
आकाश व वीर
3. प्रबोध परिख-माधवी परिख
क. सोनल-भरत परिख        ख. पराग-पूजा परिख
रचना व गौरव                     प्राची व दर्शन
4. नीलम परिख-योगेन्द्र परिख
क. समीर परिख-रागिनी पारिख
सिद्धार्थ, पार्थ व गोपी
- कांतिलाल गांधी-सरस्वती गांधी
क. शांतिलाल-सुझान गांधी
अंजली, अलका , अनिता व एना
2. प्रदीप गांधी-मंगला गांधी
प्रिया व मेघा
-रसिकलाल गांधी
-मनुबेन गांधी-सुरेन्द्र मशरूवाला
1. उर्मि देसाई-भरत देसाई
क. मृणाल देसाई-आरती देसाई       ख. रेणू देसाई

-शांतिलाल गाँधी
-सीता गांधी-शशीकांत धुबेलिया
1. कीर्ति मेनन-सुनील मेनन
सुनीता
2. उमा मिस्त्री-राजेन मिस्त्री
सपना
3. सतीश धुपेलिया-प्रतिभा धुपेलिया
मीशा, शशिका व कबीर
-अरुण गांधी-सुनंदा गांधी
क. तुषार गांधी-सोनल गांधी       ख. अर्जना प्रसाद- हरि प्रसाद
विवान व कस्तूरी                         अनिष व परितोष
-इला गांधी-मेवालाल रामगोबिन
क. कृष गाँधी
ख. आरती रामगोबिन
ग. केदार रामगोबिन-मृणाल रामगोबिन
घ. आशा रामगोबिन
ड़. आशिष रामगोबिन-अज्ञात
मीरा व निखिल
-सुमित्रा गांधी-गजानन कुलकर्णी
1. सोनाली कुलकर्णी
2. श्रीकृष्ण कुलकर्णी-नीलू कुलकर्णी
विष्णु
3. श्रीराम कुलकर्णी-जूलिया कुलकर्णी
शिव
-कहान गांधी-शिव लक्ष्मी गांधी
-उषा गोकाणी-हरीश गोकाणी
1. संजय गोकाणी-मोना गोकाणी
नताशा व अक्षय
2. आनंद गोकाणी-तेजल गोकाणी
करण व अर्जुन
-रामचंद्र गांधी-इंदू गांधी
लीना गाँधी
-तारा भट्टाचार्य-ज्योति भट्टाचार्य
1. विनायक भट्टाचार्य-लूसी भट्टाचार्य
इण्डिया अनन्या, अनुष्का तारा व एंड्रीया लक्ष्मी
2. सुकन्या भरतराम-विवेक भरतनाम
अक्षर विदूर
-राजमोहन गांधी-उषा गांधी
1. देवव्रत गांधी
2. सुप्रिया गाधी
-गोपाल कृष्ण गांधी-तारा गांधी
1. अनिता गांधी
2. दिव्या गांधी
3. रुस्तम मणिया

Thursday, September 28, 2017

मानव इतिहास में बहुत सी खोजे हुई हैं, भारत में 5000 वर्ष पुरानी हरप्पा सभ्यता हो या फिर वह इजिप्ट के पिरामिड़ क्यों ना हो। हमारा हिन्दु धर्म जिसे पहले मात्र 12000 हजार वर्ष पुराना माना जाता है, इस खोज से अब इतिहासकारों और वैज्ञानिकों को जरूर समझना चाहिए कि वास्तव में हिन्दू धर्म कितना प्राचीन है। 
इन्ही में से एक दक्षिण जर्मनी में एक बहुत ही दुर्लभ खोज हुई थी, जिसने पुरे विश्व के वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया था। उन्हें जो मिला था वह किसी “लाइन-मैन” या नरसिंह भगवान की प्रतिमा जैसा प्रतीत हो रहा था। तस्वीर में आप देख सकते हैं।।उस दुर्लभ खोज ने जो कि एक 32 हजार वर्ष पुरानी मुर्ति थी उसने पुरी दुनिया के वैज्ञानिकों को हैरत में डाल दिया था।

Friday, September 15, 2017

दिल्ली कोर्ट ने भी बताया कुरान की 24 आयातों को समाज के लिए हानिकारक

दिल्ली कोर्ट ने भी बताया कुरान की 24 आयातों को समाज के लिए हानिकारक

 

कुरान की चौबीस आयतें और उन पर दिल्ली कोर्ट का फैसला श्री इन्द्रसेन (तत्कालीन उपप्रधान हिन्दू महासभा दिल्ली) और राजकुमार ने कुरान मजीद (अनु. मौहम्मद निम्नलिखित आयतों का एक पोस्टर छापा जिसके कारण इन दोनों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए और 265 ए के अन्तर्गत (एफ.आई.आर. 237 /83 यू/एस, 235 ए, 1 पीसी होजकाजी, पुलिस स्टेशन दिल्ली) में मुकदमा चलाया गया।
1-”फिर, जब हराम के महीने बीत जाऐं, तो ‘मुश्रिको’ को जहाँ-कहीं पाओ कत्ल करो, और पकड़ो और उन्हें घेरो और
हर घातकी जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे ‘तौबा’ कर लें ‘नमाज’ कायम करें और, जकात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो। निःसंदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है।” (पा०10, सूरा. 9, आयत 5,2ख पृ. 368 ) . www.quranhindi.com/p260.htm .
2-”हे ‘ईमान’ लाने वालो! ‘मुश्रिक’ (मूर्तिपूजक) नापाकहैं।” (10.9.28 पृ. 371) . www.quranhindi.com/p265.htm .
3- ”निःसंदेह ‘काफिर तुम्हारे खुले दुश्मन हैं।” (5.4.101. पृ.239) . www.quranhindi.com/p130.htm .
4- ”हे ‘ईमान’ लाने वालों! (मुसलमानों) उन ‘काफिरों’ से लड़ो जो तुम्हारे आस पास हैं, और चाहिए कि वे तुममें
सख्ती पायें।” (11.9.123 पृ. 391) . www.quranhindi.com/p286.htm .
5- ”जिन लोगों ने हमारी ”आयतों” का इन्कार किया, उन्हें हम जल्द अग्नि में झोंक देंगे। जब उनकी खालें पक
जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल देंगे ताकि वे यातना का रसास्वादन कर लें। निःसन्देह अल्लाह
प्रभुत्वशाली तत्वदर्शी हैं” (5.4.56 पृ. 231) . www.quranhindi.com/p119.htm .
6- ”हे ‘ईमान’ लाने वालों! (मुसलमानों) अपने बापों और भाईयों को अपना मित्र मत बनाओ यदि वे ईमान की अपेक्षा ‘कुफ्र’ को पसन्द करें। और तुम में से जो कोई उनसे मित्रता का नाता जोड़ेगा, तो ऐसे ही लोग जालिम होंगे” (10.9.23 पृ. 370) . www.quranhindi.com/p263.htm .
7- ”अल्लाह ‘काफिर’ लोगों को मार्ग नहीं दिखाता” (10.9.37 पृ. 374) . www.quranhindi.com/p267.htm .
8- ”हे ‘ईमान’ लाने वालो! उन्हें (किताब वालों) और काफिरों को अपना मित्र बनाओ। अल्ला से डरते रहो यदि तुम ‘ईमान’ वाले हो।” (6.5.57 पृ. 268) . www.quranhindi.com/p161.htm .
9- ”फिटकारे हुए, (मुनाफिक) जहां कही पाए जाऐंगे पकड़े जाएंगे और बुरी तरह कत्ल किए जाएंगे।” (22.33.61 पृ. 759) . www.quranhindi.com/p592.htm .
10- ”(कहा जाऐगा): निश्चय ही तुम और वह जिसे तुम अल्लाह के सिवा पूजते थे ‘जहन्नम’ का ईधन हो। तुम अवश्य मौत के घाट उतरोगे।” कुरान 21:98 . www.quranhindi.com/p459.htm .
11- ‘और उस से बढ़कर जालिम कौन होगा जिसे उसके ‘रब’ की आयतों के द्वारा चेताया जाये और फिर वह उनसे मुँह फेर ले। निश्चय ही हमें ऐसे अपराधियों से बदला लेना है।” (21.32.22 पृ. 736) . www.quranhindi.com/p579.htm .
12- ‘अल्लाह ने तुमसे बहुत सी ‘गनीमतों’ का वादा किया है जो तुम्हारे हाथ आयेंगी,” (26.48.20 पृ. 943) . www.quranhindi.com/p713.htm .
13- ”तो जो कुछ गनीमत (का माल) तुमने हासिल किया है उसे हलाल व पाक समझ कर खाओ” (10.8.69. पृ. 359) . www.quranhindi.com/p257.htm .
14- ”हे नबी! ‘काफिरों’ और ‘मुनाफिकों’ के साथ जिहाद करो, और उन पर सखती करो और उनका ठिकाना ‘जहन्नम’ है, और बुरी जगह है जहाँ पहुँचे” (28.66.9. पृ. 1055) . www.quranhindi.com/p785.htm .
15- ‘तो अवश्य हम ‘कुफ्र’ करने वालों को यातना का मजा चखायेंगे, और अवश्य ही हम उन्हें सबसे बुरा बदला देंगे उस कर्म का जो वे करते थे।” (24.41.27 पृ. 865) . www.quranhindi.com/p662.htm .
16- ”यह बदला है अल्लाह के शत्रुओं का (’जहन्नम’ की) आग। इसी में उनका सदा का घर है, इसके बदले में कि हमारी ‘आयतों’ का इन्कार करते थे।” (24.41.28 पृ. 865) . www.quranhindi.com/p662.htm .
17- ”निःसंदेह अल्लाह ने ‘ईमानवालों’ (मुसलमानों) से उनके प्राणों और उनके मालों को इसके बदले में खरीद लिया है कि उनके लिए ‘जन्नत’ हैः वे अल्लाह के मार्ग में लड़ते हैं तो मारते भी हैं और मारे भी जाते हैं।” (11.9.111 पृ. 388) www.quranhindi.com/p283.htm .
18- ”अल्लाह ने इन ‘मुनाफिक’ (कपटाचारी) पुरुषों और मुनाफिक स्त्रियों और काफिरों से ‘जहन्नम’ की आग का वादा किया है जिसमें वे सदा रहेंगे। यही उन्हें बस है। अल्लाह ने उन्हें लानत की और उनके लिए स्थायी यातना है।” (10.9.68 पृ. 379) . www.quranhindi.com/p273.htm .
19- ”हे नबी! ‘ईमान वालों’ (मुसलमानों) को लड़ाई पर उभारो। यदि तुम में बीस जमे रहने वाले होंगे तो वे दो सौ पर प्रभुत्व प्राप्त करेंगे, और यदि तुम में सौ हो तो एक हजार काफिरों पर भारी रहेंगे, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो समझबूझ नहीं रखते।” (10.8.65 पृ. 358) .
20- ”हे ‘ईमान’ लाने वालों! तुम यहूदियों और ईसाईयों को मित्र न बनाओ। ये आपस में एक दूसरे के मित्र हैं। और जो कोई तुम में से उनको मित्र बनायेगा, वह उन्हीं में से होगा। निःसन्देह अल्लाह जुल्म करने वालों को मार्ग
नहीं दिखाता।” (6.5.51 पृ. 267) . www.quranhindi.com/p160.htm .
21- ”किताब वाले” जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं न अन्तिम दिन पर, न उसे ‘हराम’ करते हैं जिसे अल्लाह और
उसके रसूल ने हराम ठहराया है,और न सच्चे दीन को अपना ‘दीन’ बनाते हैं उनसे लड़ो यहाँ तक कि वे अप्रतिष्ठित
(अपमानित) होकर अपने हाथों से ‘जिजया’ देने लगे।” (10.9.29. पृ. 372) . www.quranhindi.com/p265.htm .
22- ”…….फिर हमने उनके बीच कियामत के दिन तक के लिये वैमनस्य और द्वेष की आग भड़का दी, और अल्लाह जल्द उन्हें बता देगा जो कुछ वे करते रहे हैं। (6.5.14 पृ. 260) . www.quranhindi.com/p151.htm .
23- ”वे चाहते हैं कि जिस तरह से वे काफिर हुए हैं उसी तरह से तुम भी ‘काफिर’ हो जाओ, फिर तुम एक जैसे हो जाओः तो उनमें से किसी को अपना साथी न बनाना जब तक वे अल्लाह की राह में हिजरत न करें, और यदि वे इससे फिर जावें तो उन्हें जहाँ कहीं पाओं पकड़ों और उनका वध (कत्ल) करो। और उनमें से किसी को साथी और सहायक मत बनाना।” (5.4.89 पृ. 237) . www.quranhindi.com/p126.htm .
24- ”उन (काफिरों) से लड़ों! अल्लाह तुम्हारे हाथों उन्हें यातना देगा, और उन्हें रुसवा करेगा और उनके मुकाबले में
तुम्हारी सहायता करेगा, और‘ईमान’ वालों के दिल ठंडे करेगा” (10.9.14. पृ. 369) . www.quranhindi.com/p262.htm .
उपरोक्त आयतों से स्पष्ट है कि इनमें ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, कपट, लड़ाई-झगड़ा, लूटमार और हत्या करने के आदेश मिलते हैं। इन्हीं कारणों से देश व विश्व में मुस्लिमों व गैर मुस्लिमों के बीच दंगे हुआ करते हैं। मैट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट श्री जेड़ एस. लोहाट ने 31 जुलाई 1986 को फैसला सुनाते हुए लिखाः ”मैंने सभी आयतों को कुरान मजीद से मिलान किया और पाया कि सभी अधिकांशतः आयतें वैसे ही उधृत की गई हैं जैसी कि कुरान में हैं। लेखकों का सुझाव मात्र है कि यदि ऐसी आयतें न हटाईं गईं तो साम्प्रदायिक दंगे रोकना मुश्किल हो जाऐगा। मैं ए.पी.पी. की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि आयतें 2,5,9,11 और 22 कुरान में नहीं है या उन्हें विकृत करके प्रस्तुत किया गया है।” तथा उक्त दोनों महानुभावों को बरी करते हुए निर्णय दिया कि- ”कुरान मजीद” की पवित्र पुस्तक के प्रति आदर रखते हुए उक्त आयतों के सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ये आयतें बहुत हानिकारक हैं और घृणा की शिक्षा देती हैं, जिनसे एक तरफ मुसलमानों और दूसरी ओर देश के शेष समुदायों के बीच मतभेदों की पैदा होने की सम्भावना है।” (ह. जेड. एस. लोहाट, मेट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट दिल्ली 31.7.1986)

Saturday, August 5, 2017

आपातकाल के पत्र लीक,इंदिरा को शेरनी कहने वाले मुँह छिपाए फिर रहे,पढ़कर होगा दहशत का अंदाज़ा


आपातकाल के पत्र लीक,इंदिरा को शेरनी कहने वाले मुँह छिपाए फिर रहे,पढ़कर होगा दहशत का अंदाज़ा

इतिहास कोंग्रेस देश पॉलिटिक्स भारत
आपातकाल के 42 साल बाद इन सेंसर-आदेशों को पढ़ने पर उस डरावने माहौल का अंदाज़ा लगता है जिसमें पत्रकारों को काम करना पड़ा था, अख़बारों पर कैसा अंकुश था और कैसी-कैसी ख़बरें रोकी जाती थीं.‘सूचना विभाग में सेंसर के श्री वाजपेई ने फोन किया था कि सेंसर-आदेशानुसार परिवार नियोजन, शिक्षा शुल्क में वृद्धि तथा सिंचाई दरों में वृद्धि के विरुद्ध किसी प्रकार का समाचार न छापा जाए. इसके अतिरिक्त, छात्र-आंदोलन की ख़बरें भी नहीं छपेंगी.’
11 जुलाई, 1976 को लखनऊ के प्रतिष्ठित दैनिक ‘स्वतंत्र भारत’ के संपादकीय विभाग के एक वरिष्ठ सदस्य ने ये पंक्तियां टाइप करके निर्देश-रजिस्टर में लगाईं ताकि सभी देखें और पालन कर सकें. देशभर के सभी अख़बारों में उन दिनों रोजाना ऐसे कई-कई सेंसर-आदेश पहुंचते थे. अख़बारों की खबरों पर कड़ा पहरा था. आज से 42 वर्ष पहले, 25 जून, 1975 की रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने और बढ़ते राजनीतिक विरोध को कुचलने के लिए देश में आंतरिक आपातकाल लागू कर दिया था. जनता के संवैधानिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे. विरोधी नेता गिरफ़्तार कर जेल में डाले गए. प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई थी.
अख़बारों में क्या छपेगा क्या नहीं यह संपादक नहीं, सेंसर अधिकारी तय करते थे. राज्यों के सूचना विभाग, भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) और जिला-प्रशासन के अधिकारियों को सेंसर-अधिकारी बनाकर अख़बारों पर निगरानी रखने का काम दिया गया था. ये अधिकारी संपादकों-पत्रकारों के लिए निर्देश जारी करते थे. खुद उन्हें ये निर्देश दिल्ली के उच्चाधिकारियों, कांग्रेस नेताओं, ख़ासकर इंदिरा गांधी और उनके छोटे बेटे संजय गांधी की चौकड़ी से प्राप्त होते थे. इन पर अमल करना अनिवार्य था अन्यथा गिरफ़्तारी से लेकर प्रेस-बंदी तक हो सकती थी.
अगस्त, 1977 में मैंने दैनिक ‘स्वतंत्र भारत’ में बतौर प्रशिक्षु सह-संपादक काम करना शुरू किया तो संपादकीय-निर्देश-रजिस्टर में नत्थी कई सेंसर-आदेश देखे थे. बाद में उसमें से कुछ सेंसर-आदेश अपने लिए सुरक्षित रख लिए थे.
इमरजेंसी के 42 साल बाद आज इन चंद निर्देशों को पढ़ने पर उस डरावने माहौल का अंदाज़ा लगता है जिसमें पत्रकारों को काम करना पड़ा था, अख़बारों पर कैसा अंकुश था और कैसी-कैसी ख़बरें रोकी जाती थीं.
एक सेंसर-आदेश 20 जुलाई, 1976 को तत्कालीन संपादक अशोक जी के हस्ताक्षर से इस तरह था- ‘नसबंदी में मृत्यु या अन्य धांधली की ख़बरें न दी जाएं. प्राप्त होने पर इन्हें समाचार संपादक श्री दीक्षित या मुझे दिया जाए.’
इसी बारे में एक सेंसर-आदेश 1 नवंबर 1976 का भी है- ‘विधानमण्डल का आज से अधिवेशन शुरू हो रहा है. परिवार नियोजन के संबंध में कुछ ज़िलों में कुछ अप्रिय घटनाएं हुई थीं. समाचार देते समय इन घटनाओं के कृपया ‘टोन डाउन’ करें और इस सम्बंध में पुराने निर्देशों का पालन करें. (ध्रुव मालवीय का फोन)- हस्ताक्षर, सहायक संपादक’

गौरतलब है कि इमरजेंसी में संजय गांधी ने सनक की तरह जनसंख्या-नियंत्रण कार्यक्रम चलवाया. सरकारी कर्मचारियों, डॉक्टरों आदि को नसबंदी के बड़े लक्ष्य दिए गए. अविवाहित युवकों, बूढ़ों, भिखारियों तक को पकड़-पकड़कर उनकी जबरन नसबंदी की गयी. असुरक्षित नसबंदी के कारण देश भर में बहुत मौतें हुई थीं. रोहिण्टन मिस्त्री के अंग्रेजी उपन्यास ‘अ फाइन बैलेंस’ में इन सबका मार्मिक और दहलाने वाला चित्रण है. एक और सेंसर-आदेश देखिए- ‘सेंसर अधिकारी, एमआर अवस्थी का फोन, 9 अक्टूबर 1976 को- भारत और अन्य किसी देश के बीच शस्त्रास्त्र अथवा रक्षा समझौते की सूचना तथा उस पर कोई टिप्पणी प्रकाशित न की जाए.
बस्ती जिले में बीडीओ तथा एडीओ की हत्या का समाचार न छापा जाए. -सहायक संपादक’ बिना तारीख़ का एक सेंसर-नोट कहता है- ‘गुजरात हाईकोर्ट के जजों के तबादले संबंधी बहस का कोई समाचार बिना सेंसर कराए नहीं जा सकता.’ (1976 में गुजरात हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने अपने तबादले को बड़ा मुद्दा बनाकर अदालत में चुनौती दी थी और भारत सरकार को भी पार्टी बना लिया था. इस पर लंबी अदालती बहस चली थी) 10 दिसंबर, 1976 को समाचार संपादक के हस्ताक्षर से जारी आदेश- 14 दिसम्बर को संजय गांधी का जन्म-दिवस है. इस संदर्भ में किसी भी कांग्रेसी नेता का संदेश नहीं छपेगा. सूचना विभाग से टेलीफोन पर सूचना मिली.’
28 दिसम्बर (सन दर्ज नहीं) को समाचार संपादक के हस्ताक्षर से जारी अंग्रेज़ी में टाइप किया हुआ सेंसर-निर्देश-
‘कांग्रेस, यूथ कांग्रेस और अखिल भारतीय कांग्रेस के भीतर अथवा आपस में विवाद और गुटबाजी के बारे में कोई भी ख़बर, रिपोर्ट और टिप्पणी कतई नहीं दी जाए (शुड बी किल्ड). यह विशेष रूप से केरल, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा कांग्रेस की ख़बरों पर लागू होगा.’
25 अक्टूबर (सन दर्ज नहीं) का अंग्रेजी में हस्तलिखित नोट- ‘सेंसर ऑफिस से श्री पाठक का निर्देश- यह फ़ैसला हुआ है कि 29 अक्टूबर से होने वाले चौथे एशियाई बैडमिंटन टूर्नामेंट में चीन की बैडमिंटन टीम की भागीदारी भारतीय अख़बारों में बहुत दबा दी जाए.’
यह समझ पाना मुश्किल है कि चीन की बैडमिंटन टीम के भारत आकर खेलने की ख़बर तत्कालीन इंदिरा सरकार क्यों दबाना चाहती थी.
इस लेखक के हाथ लगे सेंसर-आदेश इमरजेंसी लगने के क़रीब साल भर बाद के हैं. बिल्कुल शुरू के आदेश और सख़्त रहे होंगे. कुछ आदेश ऐसे भी होंगे जो मालिकों या संपादकों को सीधे सुनाए गए होंगे, बिना कहीं दर्ज किए.
सभी अख़बारों को सेंसर-आदेशों का पालन करना पड़ा था. विरोध के प्रतीक-रूप में कतिपय अख़बारों ने एकाधिक बार अपने संपादकीय की जगह ख़ाली छोड़ी. कुछ छोटे लेकिन न झुकने वाले पत्रों ने प्रकाशन स्थगित किया या सरकार ने ही उन्हें बंद कर संपादकों-पत्रकारों को जेल में डाल दिया था.
25 जून 1975 की रात लागू इमरजेंसी 21 मार्च 1977 तक रही. यह पूरा दौर आज़ाद भारत के लिए बहुत भयानक था. लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए सबसे काला दौर, जब हर प्रकार का प्रतिरोधी स्वर कुचल दिया गया था.
आपातकाल हटने के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस (इ) की बहुत बुरी पराजय हुई. इंदिरा गांधी और संजय दोनों चुनाव हारे. उन्हें अपने सबसे बुरे दिन देखने पड़े थे.
लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनने की कोशिश करने वालों के लिए वह दौर एक बड़ा और ज़रूरी सबक है. इसीलिए अभी हाल में एनडीटीवी के मामले में दिल्ली प्रेस क्लब में हुई विरोध सभा में कुलदीप नैयर से लेकर अरुण शौरी तक ने याद दिलाया कि जिस किसी ने प्रेस की आज़ादी पर हमला किया, उसने अपने ही हाथ जलाए.
(लेखक हिंदुस्तान अख़बार के लखनऊ एवं यूपी संस्करण के पूर्व कार्यकारी संपादक हैं)

Thursday, August 3, 2017